ब्रह्माजी कहते हैं- बेटा सुनो अब मैं पद्म पुराण का वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य इसका प्रसन्नतापूर्वक पाठ और श्रवण करते है उन्हे यह महान पुण्य देने वाला है। जैसे सम्पूर्णदेहधारी मनुष्य पांच ज्ञानेन्द्रियों से युक्त बताया जाता है,उसी प्रकार यह पद्मपुराण पांच खण्डोंसे युक्त कहा गया है। ब्रह्मन ! जिसमें महर्षि पुलस्त्य ने भीष्म को सृष्टि आदि के क्रम से नाना प्रकार के उपाख्यान और इतिहास आदि के साथ विस्तारपूर्वक कहा गया है,जहां पुष्करतीर्थ का माहत्म्य विस्तारपूर्वक कहा गया है,जिसमे ब्रह्म यज्ञ की विधि,वेदपाठ आदि का लक्षण नाना प्रकार के दानों व्रतों का पृथक पृथक निरूपण पार्वती का विवाह तारकासुर का विस्तृत उपाख्यान तथा गौ आदि का माहात्म्य है,जो सबको पुण्य देने वाला है,जिसमे कालकेय आदि दैत्यों के वध की पृथक पृथक कथा दी गयी है,तथा द्विजश्रेष्ठ ! जहां ग्रहों के पूजन और दान की विधि भी बताई गयी है,वह महात्मा श्रीव्यासजी के द्वारा कहा हुआ सृष्टि-खण्ड है। पिता माता आदि की पूजनीयता के विषय में शिवशर्मा की प्राचीन कथा सुव्रत की कथा वृत्रासुर के वध की कथा,पृथु वेन और सुनीथा की कथा,सुकला का उपाख्यान,धमका आख्यान,पिता की सेवा के विषय में उपाख्यान नहुष की कथा,ययाति चरित्र,गुरुतीर्थ का निरूपण,रजा और जैमिनि के संवाद में अत्यंत आश्चर्यमयी कथा,अशोक सुन्दरी की कथा,हुण्द दैत्य का वध,कामोदा की कथा,बिहुण्ड दैत्य का वध,महात्मा च्यवन के साथ कुंज का संवाद तदनन्तर सिद्दोपाख्यान और इस खण्ड के फ़ल का विचार-ये सब विषय जिसमे कहे गये है,वह सूत शौनक संवाद रूप "भूमि-खण्ड" कहा गया है।
जहां सौति तथा महर्षियों के संवादरूप से ब्रह्मखण्ड की उत्पत्ति बतायी गयी है,पृथ्वी सहित सम्पूर्ण लोकों की स्थिति और तीर्थों का निरूपण किया गया है,इसके बाद नर्मदा जी की उत्पत्ति की कथा और उनके तीर्थों का पृथक पृथक वर्णन है,जिससे कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों की पुण्यमयी कथा कही गयी है,कालिन्दी की पुण्यकथा काशी माहात्म्य वर्णन तथा गया और प्रयाग के पुण्यमय माहात्म्य का निरूपण है,वर्ण और आश्रम के अनुकूल कर्मयोग का निरूपण,पुण्यकर्म की कथा को लेकर जैमिनि और और व्यास संवाद,समुद्र मंथन की कथा व्रत सम्बन्धी तथा कार्तिक के पांच दिन (भीष्म पंचक) का माहात्म्य तथा सर्वापाराध निवारक स्तोत्र ये सब विषय जहां आये है,वह स्वर्ग-खण्ड कहा गया है,ब्रह्मन ! यह सब पातकों का नाश करने वाला है।
रामाश्वमेघ के प्रसंग में प्रथम रामका राज्याभिषेक अगस्त्य आदि महर्षियों का आगमन पुलस्त्यवंश का वर्णन,अश्वमेघ का उपदेश के साथ अश्वमेघीय अश्व का पृथ्वी पर विचरण,अनेक राजाओं की पुण्यमयी कथा,जगन्नाथजी की महिमा का निरूपण वृन्दावन का सर्वापाप नाशक माहात्म्य कृष्णावतार धारी श्रीहरि की नित्य लीलाओं का कथन वैशाख स्नान दान और पूजन का फ़ल भूमि वाराह संवाद यम और ब्राह्मण की कथा,राजदूतों का संवाद श्रीकृष्ण स्तोत्र का निरूपण,शिवशम्भु समागम,दधीचि की कथा,भस्म का अनुपम माहात्म्य उत्तम शिव माहात्मय,देवरातसुतोपाख्यान,पुराणवेत्ता की प्रसंसा गौतम का उपाख्यान और शिवगीता तथा कल्पान्तर में भराद्वाज आश्रम में श्रीरामकथा आदि का विषय पातालखण्ड के अन्तर्गत है। जो सदा इसक श्रवण और पाठ करते है,उनके सब पापों का नाश करके यह उन्हें सम्पूर्ण अभीष्ट फ़लों की प्राप्ति कराता है।
पांचवें खण्ड में पहले भगवान शिव के द्वारा गौरीदेवी के प्रीति कहा हुआ पर्वतोपाख्यान है,तत्पश्चात जालन्धर की कथा,श्रीशैल आदि का माहात्मय कीर्तन और राजा सगर की पुण्यमयी कथा है। उसके बाद गंगा प्रयाग काशी और गया का अधिक पुण्यदायक माहात्मय कहा गया है। फ़िर अन्नदि का दान का माहात्मय और महाद्वादशी व्रत का उल्लेख है। तत्पश्चात चौबीस एकादशियों का पृथक पृथक माहात्मय कहा गया है। फ़िर विष्णु धर्म का निरूपण और विष्णु सहस्त्र नाम का वर्णन है,उसके बाद कार्तिक व्रत का माहात्मय माघ स्नान का फ़ल तथा जम्बू द्वीप के तीर्थों का पापनाशक महिमा का वर्णन है,फ़िर साबरमती का माहात्मय नृसिंहोंत्पत्ति कथा,देवशर्मा आदि का उपाख्यान और गीता माहात्म्य का वर्णन है। तदनन्तर भक्ति क आख्यान श्रीमद्भागवत का माहात्मय और अनेक तीर्थों की कथा से युक्त इन्द्रप्रस्थ की महिमा है। इसके बाद मन्त्ररत्न का कथन त्रिपाद विभूति का वर्णन तथा मत्स्य आदि अवतारों की कथा है,तत्पश्चात अष्टोत्तरशत दिव्य रामनाम और उसके महात्म्य का वर्णन है,वाडव! फ़िर महर्षि भृगु द्वारा भगवान विष्णु के वैभव की परीक्षा का उल्लेख किया गया है,यह प्रकार पांचवां खण्ड उत्तर खण्ड कहा गया है।
श्रीब्रह्माजी कहते है- वत्स! सुनो,अब मैं वैष्णव महापुराण का वर्णन करता हूँ,इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार है,यह सब पातकों का नाश करने वाला है। इसके पूर्वभाग में शक्ति नन्दन पराशर ने मैत्रेय को छ: अंश सुनाये है,उनमें प्रथम अंश में इस पुराण की अवतरणिका दी गयी है। आदि कारण सर्ग देवता आदि जी उत्पत्ति समुद्र मन्थन की कथा दक्ष आदि के वंश का वर्णन ध्रुव तथा पृथु का चरित्र प्राचेतस का उपाख्यान प्रहलाद की कथा और ब्रह्माजी के द्वारा देव तिर्यक मनुष्य आदि वर्गों के प्रधान प्रधान व्यक्तियो को पृथक पृथक राज्याधिकार दिये जाने का वर्णन इन सब विषयों को प्रथम अंश कहा गया है। प्रियव्रत के वंश का वर्णन द्वीपों और वर्षों का वर्णन पाताल और नरकों का कथन,सात स्वर्गों का निरूपण अलग अलग लक्षणों से युक्त सूर्यादि ग्रहों की गति का प्रतिपादन भरत चरित्र मुक्तिमार्ग निदर्शन तथा निदाघ और ऋभु का संवाद ये सब विषय द्वितीय अंश के अन्तर्गत कहे गये हैं। मन्वन्तरों का वर्णन वेदव्यास का अवतार,तथा इसके बाद नरकों से उद्धार का वर्णन कहा गया है। सगर और और्ब के संवाद में सब धर्मों का निरूपण श्राद्धकल्प तथा वर्णाश्रम धर्म सदाचार निरूपण तथा माहामोह की कथा,यह सब तीसरे अंश में बताया गया है,जो पापों का नाश करने वाला है। मुनि श्रेष्ठ ! सूर्यवंश की पवित्र कथा,चन्द्रवंश का वर्णन तथा नाना प्रकार के राजाओं का वृतान्त चतुर्थ अंश के अन्दर है। श्रीकृष्णावतार विषयक प्रश्न,गोकुल की कथा,बाल्यावस्था में श्रीकृष्ण द्वारा पूतना आदि का वध,कुमारावस्था में अघासुर आदि की हिंसा,किशोरावस्था में कंस का वध,मथुरापुरी की लीला, तदनन्तर युवावस्था में द्वारका की लीलायें समस्त दैत्यों का वध,भगवान के प्रथक प्रथक विवाह,द्वारका में रहकर योगीश्वरों के भी ईश्वर जगन्नाथ श्रीकृष्ण के द्वारा शत्रुओं के वध के द्वारा पृथ्वी का भार उतारा जाना,और अष्टावक्र जी का उपाख्यान ये सब बातें पांचवें अंश के अन्तर्गत हैं। कलियुग का चरित्र चार प्रकार के महाप्रलय तथा केशिध्वज के द्वारा खाण्डिक्य जनक को ब्रह्मज्ञान का उपदेश इत्यादि छठा अंश कहा गया है। इसके बाद विष्णु पुराण का उत्तरभाग प्रारम्भ होता है,जिसमें शौनक आदि के द्वारा आदरपूर्वक पूछे जाने पर सूतजी ने सनातन विष्णुधर्मोत्तर नामसे प्रसिद्ध नाना प्रकार के धर्मों कथायें कही है,अनेकानेक पुण्यव्रत यम नियम धर्मशास्त्र अर्थशास्त्र वेदान्त ज्योतिष वंशवर्णन के प्रकरण स्तोत्र मन्त्र तथा सब लोगों का उपकार करने वाली नाना प्रकार की विद्यायें सुनायी गयीं है,यह विष्णुपुराण है,जिसमें सब शास्त्रों के सिद्धान्त का संग्रह हुआ है। इसमे वेदव्यासजी ने वाराकल्प का वृतान्त कहा है,जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।
ब्रह्माजी कहते है — ब्रह्मन सुनो! अब मै वायु पुराण का लक्षण बतलाता हूँ। जिसके श्रवण करने पर परमात्मा शिव का परमधाम प्राप्त होता है। यह पुराण चौबीस हजार श्लोकों का बताया गया है। जिसमें वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसंगों में धर्मों का उपदेश किया है। उसे वायु पुरण कहते है। यह पूर्व और उत्तर दो भागों से युक्त है। ब्रह्मन! जिसमें सर्ग आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है,जहां भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में राजाओं के वंश का वर्णन है और जहां गयासुर के वध की कथा विस्तार के साथ कही गयी है,जिसमें सब मासों का माहात्मय बताकर माघ मास का अधिक फ़ल कहा गया है जहां दान दर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तार से कहे गये है,जिसमें पृथ्वी पाताल दिशा और आकाश में विचरने वाले जीवों के और व्रत आदि के सम्बन्ध में निर्णय किया गया है,वह वायुपुराण का पूर्वभाग कहा गया है। मुनीश्वर ! उसके उत्तरभाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है,और विस्तार के साथ शिवसंहिता कही गयी है जो भगवान सम्पूर्ण देवताओं के लिये दुर्जेय और सनातन है,वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते है,वही यह नर्मदा का जल ब्रह्मा है,यही विष्णु है,और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात शिव है। यह नर्मदा जल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है,निश्चय ही भगवान शिवने समस्त लोकों का हित करने के लिये अपने शरीर से इस नर्मदा नदी के रूप में किसी दिव्य शक्ति को ही धरती प्रर उतारा है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते है,वे भगवान रुद्र के अनुचर होते है,और जिनका दक्षिण तट पर निवास है,वे भगवान विष्णु के लोकों में जाते है,ऊँकारेश्वर से लेकर पश्चिम समुद्र तट तक नर्मदा नदी में दूसरी नदियों के पैतीस पापनाशक संगम है,उनमे से ग्यारह तो उत्तर तटपर है,और तेईस दक्षिण तट पर। पैंतीसवां तो स्वयं नर्मदा और समुद्र का संगम कहा गया है,नर्मदा के दोनों किनारों पर इन संगमों के साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ है। मुनीश्वर ! इनके सिवाय अन्य साधारण तीर्थ तो नर्मदा के पग पग पर विद्यमान है,जिनकी संख्या साठ करोड साठ हजार है। यह परमात्मा शिव की संहिता परम पुण्यमयी है,जिसमें वायुदेवता ने नर्मदा के चरित्र का वर्णन किया है,जो इस पुराण को सुनता है या पढता है,वह शिवलोक का भागी होता है।
ब्रह्माजी कहते है — मरीचे ! सुनो,वेदव्यासजी ने जो वेद तुल्य श्रीमदभागवत नामक महापुराण का सम्पादन किया है,वह अठारह हजार श्लोकों का बतलाया है,यह पुराण सब सब पापों का नाश करने वाला है। यह बारह शाखाओं से युक्त कल्प वृक्ष रूप है। विप्रवर! इसमे विश्वरूप भगवान का ही प्रतिपादन किया गया है। इसके पहले स्कन्ध में सूत और शौनकादि ऋषियों के समागम का प्रसंग उठाकर व्यासजी तथा पाण्डवों के पवित्र चरित्र का वर्णन किया गया है,इसके बाद परीक्षिति के जन्म से लेकर प्रायोपवेशन तक की कथा कही गयी है। यहीं तक प्रथम स्कन्ध का विषय है। फ़िर परीक्षित शुक सम्वाद में स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार की धारणाओं का निरूपण है,इसके बाद ब्रह्म नारद के संवाद में भगवान के अवतार सम्बन्धी अमृत रूपी चरित्रों का वर्णन है,फ़िर पुराण का लक्षण कहा गया है,बुद्धिमान व्यासजी ने यह द्वितीय स्कन्ध का विषय बताया है। यह सृष्टि के कारण तत्वों की उत्पत्ति का प्रतिपादक है। इसके बाद विदुर चरित्र मैत्रेयजी के साथ विदुर का समागम,परमात्मा ब्रह्म से सृष्टिक्रम का निरूपण और महर्षि कपिल द्वारा कहा हुआ सांख्य यह सब विषय तृतीय स्कन्ध के अन्तर्गत बताया गया है। तदनन्तर पहले सती चरित्र फ़िर ध्रुव का चरित्र तत्पश्चात राजा पृथु का पवित्र आख्यान फ़िर राजा प्राचीन बहर्षि की कथा यह सब विसर्ग विषयक परम उत्तम चौथा स्कन्ध कहा गया है। राजा प्रियव्रत और उनके पुत्रों का पुण्यदायक चरित्र ब्रह्माण्ड के अनतर्गत विभिन्न लोकों का वर्णन तथा नरकों की स्थिति यह संस्थान विषयक पांचवा स्कन्ध है। अजामिल चरित्र दक्ष प्रजापति द्वारा की हुई सृष्टि रचना वृत्रासुर की कथा और मरुद्गणों का पुण्यदायक जन्म यह सब व्यासजी के द्वारा छठा स्कन्ध कहा गया है। वत्स! प्रहलाद का पुण्य चरित्र वर्णाश्रम धर्म का निरूपण यह सातवां स्कन्ध बताया गया है। यह ऊति अथवा कर्मवासना विषयक स्कन्ध है। इसमें उसी का प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात मन्वन्तरनिरूपण के प्रसंग में गजेन्द्र मोक्ष की कथा समुद्रमन्थन बालि के ऐश्वर्य की वृद्धि और उनके बन्धन तथा मत्स्यावतार चरित्र यह आठवां स्कन्ध कहा गया है। महामते! सूर्यवंश का वर्णन और चन्द्रवंश का निरूपण यह वंशानुगतचरित विषयक नवां स्कन्ध बताया गया है,श्रीकृष्ण का बालचरित कुमारावस्था की लीलायें ब्रज में निवास किशोरावस्था की लीलायें मथुरा में निवास युवावस्था में द्वारका में निवास और भूभारहरण यह निरोध विषयक दसवां स्कन्ध है। नारद वासुदेव संवाद यदु दत्तात्रेय संवाद, और श्रीकृष्ण के साथ उद्धव का संवाद आपस के कलह से यादवों का संहार यह सब मुक्ति विषयक ग्यारहवां स्कन्ध है। भविष्य राजाओं का वर्णन कलिधर्म का निर्देश राजा परीक्षित के मोक्ष का प्रसंग वेदों की शाखाओं का विभाजन मार्कण्डेय जी की तपस्या सूर्य देव की विभूतियों का वर्णन तत्पश्चात भगवती विभूति का वर्णन और अन्त में पुराणों की श्लोक श्लोक संख्या का प्रतिपादन किया गया है,यह सब आश्चर्य विषयक बारहवां स्कन्ध है। वत्स! इस प्रकार तुम्हें श्रीमदभागवद पुराण का परिचय दिया गया है। यह वक्ता और श्रोता उपदेशक अनुमोदक और सहायक सबको भक्ति भोग और मोक्ष देने वाला है।
ब्रह्माजी कहते है — ब्रह्मन ! सुनो,अब मैं नारदीय पुराण का वर्णन करता हूँ। इसके अन्दर पच्चीस हजार श्लोक है,इसमे वृहत्कल्प की कथा का आश्रय लिया गया है,इसमें पूर्व भाग के प्रथम पाद में पहले सूत शौनक संवाद है,फ़िर सृष्टि का संक्षेप से वर्णन है,फ़िर महात्मा सनक के द्वारा नाना प्रकार के धर्मों की पुण्यमयी कथायें कही गयीं है। पहले पाद का नाम प्रवृत्तिधर्म है,दूसरा पाद मोक्ष धर्म के नाम से प्रसिद्ध है,उसमें मोक्ष के उपायों का वर्णन है। वेदांगों का वर्णन और शुकदेवजी की उत्पत्ति का प्रसंग विस्तार के साथ आया है। सनन्दनजी ने महात्मा नारदजी को इस द्वितीय पादका उपदेश दिया किया है। तृतीय पाद में सनत्कुमार ने मुनि ने नारदजी को इस द्वितीय पाद का उपदेश दिया है,जो तन्त्रवर्णित पशुपाशविमोक्ष नाम से जाना जाता है। फ़िर गणेशजी सूर्य भगवान विष्णु शिव और शक्ति आदि के मन्त्रों का शोधन दीक्षा मन्त्रोद्धार पूजन प्रयोग कवच सहस्त्रनाम और स्तोत्र का क्रमश: वर्णन किया है। तदनन्तर चतुर्थपाद में सनातन मुनि ने नारदजी से पुराणों का लक्षण उनकी श्लोक संख्या तथा दान का पृथक पृथक फ़ल बताया है। साथ ही उन दोनों अलग अलग समय भी नियत किया गया है। इसके बाद चैत्र आदि सब मासों में पृथक पृथक प्रतिपदा आदि तिथियों का सर्वपापनाशक व्रत बताया है,यह बृहदाख्यान नामक पूर्वभाग बताया गया है। इसके उत्तर भाग में एकादसी व्रत सम्बन्धी किये हुये प्रश्न के उत्तर में महर्षि वशिष्ठ के साथ राजा मान्धाता का संवाद उपस्थित किया गयाहै। तत्पश्चात राजा रुक्मांगद की पुण्यमयी कथा मोहिनी की उत्पत्ति उसके कर्म पुरोहित वसु का मोहिनी के लिये शाप फ़िर शाप से उसके उद्धार का कार्य,गंगा की पुण्यमयी कथा गयायात्रा का वर्णन,काशी का अनुपम माहात्म्य पुरुषोत्तम क्षेत्र का वर्णन,उस क्षेत्र की यात्रा विधि,तत्सम्बन्धी अनेक उपाख्यान प्रयाग कुरुक्षेत्र और हरिद्वार का माहात्म्य,कामोदा की कथा,बदरी तीर्थ का माहात्मय कामाक्षा और प्रभास क्षेत्र की महिमा,पुष्कर क्षेत्र का माहात्मय,गौतम मुनि का आख्यान,वेदपादस्तोत्र,गोकर्ण क्षेत्र का माहात्म्य, लक्षमणजी की कथा,सेतु महात्मय कथन,नर्मदा के तीर्थों का वर्णन,अवन्तीपुरी की महिमा,तदनन्तर मथुरा माहात्मय,वृन्दावन की महिमा,वसु का ब्रह्मा के निकट जाना तत्पश्चात मोहिनी का तीर्थों में भ्रमण आदि विषय है।
ब्रह्माजी कहते है— मुने! अब मै तुम्हे मारकण्डेय पुराण का परिचय देता हूँ। यह पुराण पढने और सुनने वालों के लिये हमेशा पुण्यदायी है। इसके अन्दर पक्षियों को प्रवचन का अधिकारी बनाकर उनके द्वारा सब धर्मों का निरूपण किया गया है। यह मारकण्डेय पुराण नौ हजार श्लोकों का संग्रह है। इसमे कहा जाता है कि पहले मार्कण्डेयजी के समीप जैमिनि का प्रवचन है। फ़िर धर्म संज्ञम पक्षियों की कथा कही गयी है। फ़िर उनके पूर्व जन्म की कथा और देवराज इन्द्र के कारण उन्हे शापरूप विकार की प्राप्ति का कथन है,तदनन्तर बलभद्रजी की तीर्थ यात्रा,द्रौपदी के पांचों पुत्रों की कथा,राजा हरिश्चन्द्र की पुण्यमयी कथा,आडी और बक पक्षियों का युद्ध,पिता और पुत्र का आख्यान,दत्तात्रेयजी की कथा,महान आख्यान सहित हैहय चरित्र,अलर्क चरित्र, मदालसा की कथा,नौ प्रकार की सृष्टि का पुण्यमयी वर्णन,कल्पान्तकाल का निर्देश,यक्ष-सृष्टि निरूपण,रुद्र आदि की सृष्टि,द्वीपचर्या का वर्णन,मनुओं की अनेक पापनाशक कथाओं का कीर्तन और उन्ही मे दुर्गाजी की अत्यन्त पुण्यदायिनी कथा है। जो आठवें मनवन्तर के प्रसंग में में कही गयी है। तत्पश्चात तीन वेदों के तेज से प्रणव की उत्पत्ति सूर्य देव की जन्म की कथा,उनका माहात्मय वैवस्त मनु के वंश का वर्णन,वत्सप्री का चरित्र, तदनन्तर महात्मा खनित्र की पुण्यमयी कथा,राजा अविक्षित का चरित्र किमिक्च्छिक व्रत का वर्णन,नरिष्यन्त चरित्र,इक्ष्वाकु चरित्र,नल चरित्र,श्री रामचन्द्र के उत्तम कथा,कुश के वंश का वर्णन,सोमवंश का वर्णन,पुरुरुवा की पुण्यमयी कथा,राजा नहुष का अद्भुत वृतांत,ययाति का पवित्र चरित्र,यदुवंश का वर्णन,श्रीकृष्ण की बाललीला,उनकी मथुरा द्वारका की लीलायें,सब अवतारों की कथा,सांख्यमत का वर्णन,प्रपंच के मिथ्यावाद का वर्णन,मार्कण्डेयजी का चरित्र,तथा पुराणा श्रवण आदि का फ़ल यह सब विषय मार्कण्डेय पुराण में बताये गये है।
ब्रह्माजी बोले— अब मैं अग्नि पुराण का कथन करता हूँ। इसमें अग्निदेव ने ईशान कल्प का बखान महर्षि वशिष्ठ से किया है। इसमे पन्द्रह हजार श्लोक है,इसके अन्दर पहले पुराण विषय के प्रश्न है फ़िर अवतारों की कथा कही गयी है,फ़िर सृष्टि का विवरण और विष्णुपूजा का वृतांत है। इसके बाद अग्निकार्य,मन्त्र,मुद्रादि लक्षण,सर्वदीक्षा विधान,और अभिषेक निरूपण है। इसके बाद मंडल का लक्षण,कुशामापार्जन,पवित्रारोपण विधि,देवालय विधि,शालग्राम की पूजा,और मूर्तियों का अलग अलग विवरण है। फ़िर न्यास आदि का विधान प्रतिष्ठा पूर्तकर्म,विनायक आदि का पूजन,नाना प्रकार की दीक्षाओं की विधि,सर्वदेव प्रतिष्ठा,ब्रहमाण्ड का वर्णन,गंगादि तीर्थों का माहात्म्य,द्वीप और वर्ष का वर्णन,ऊपर और नीचे के लोकों की रचना,ज्योतिश्चक्र का निरूपण,ज्योतिष शास्त्र,युद्धजयार्णव,षटकर्म मंत्र,यन्त्र,औषधि समूह,कुब्जिका आदि की पूजा,छ: प्रकार की न्यास विधि,कोटि होम विधि,मनवन्तर निरूपण ब्रह्माचर्यादि आश्रमों के धर्म,श्राद्धकल्प विधि,ग्रह यज्ञ,श्रौतस्मार्त कर्म,प्रायश्चित वर्णन,तिथि व्रत आदि का वर्णन,वार व्रत का कथन,नक्षत्र व्रत विधि का प्रतिपादन,मासिक व्रत का निर्देश,उत्तम दीपदान विधि,नवव्यूहपूजन,नरक निरूपण,व्रतों और दानों की विधि,नाडी चक्र का संक्षिप्त विवरण,संध्या की उत्तम विधि,गायत्री के अर्थ का निर्देश,लिंगस्तोत्र,राज्याभिषेक के मंत्र,राजाओं के धार्मिक कृत्य,स्वप्न सम्बन्धी विचार का अध्याय,शकुन आदि का निरूपण,मंडल आदि का निर्देश,रत्न दीक्षा विधि,रामोक्त नीति का वर्णन,रत्नों के लक्षण,धनुर्विद्या,व्यवहार दर्शन,देवासुर संग्राम की कथा,आयुर्वेद निरूपण,गज आदि की चिकित्सा,उनके रोगों की शान्ति,गो चिकित्सा,मनुष्यादि की चिकित्सा,नाना प्रकार की पूजा पद्धति,विविध प्रकार की शान्ति,छन्द शास्त्र,साहित्य,एकाक्षर, आदि कोष,प्रलय का लक्षण,शारीरिक वेदान्त का निरूपण,नरक वर्णन,योगशास्त्र,ब्रह्मज्ञान तथा पुराण श्रवण का फ़ल ही अग्निपुराण के अंग बताये गये है।