पुराण

ब्रह्माजी कहते है — भविष्य पुराण को सभी लोगों के मनोरथ को पूरा करने वाला बताया गया है। इस पुराण में ब्रह्मा को सम्पूर्ण देवताओं का आदि स्त्रष्टा बताया गया है। पूर्वकाल में सृष्टि के लिये स्वयम्भू मनु उत्पन्न हुये,उन्होने मुझे प्रणाम करके सर्वार्थसाधक धर्म के विषय में प्रशन किया,तब मैने प्रसन्न होकर उन्हे धर्म संहिता का उपदेश किया। परम बुद्धिमान व्यासजी जब पुराणों का विस्तार करने लगे तो उन्होने उस धर्म संहिता के पांच विभाग किये,उनमे नाना प्रकार की आश्चर्यजनक कथाऒं से युक्त अघोरकल्प का वृतांत है,उस पुराण में पहला पर्व ब्रह्मपर्व के नाम से प्रसिद्ध है,इसी में ग्रन्थ का उपक्रम है,सूत शौनक संवाद में पुराणविषयक प्रश्न है,इसमे अधिकतर सूर्यदेव का ही चरित्र है,अन्य सब उपाख्यान भी इसमे आये हैं.इसमें सृष्टि आदि के लक्षण बताये गये हैं,शास्त्रों क तो यह सर्वस्वरूप है,इसमे पुस्तक लेखक और लेख्यका भी लक्षण दिया गया है। सब प्रकार के संस्कारों का भी लक्षण बताया गया है,पक्ष की आदि सात तिथियों के सात कल्प कहे गये है,अष्टमी आधि तिथियों के शेष आठ कल्प वैष्णवपर्व में बताये गये है,शैवपर्व में ब्रह्मपर्व से भिन्न कथायें है,सौरपर्व में अन्तिम कथाओं का सम्बन्ध देखा जाता है,तत्पश्चार प्रतिसर्ग पर्व है जिसमें पुराण के उपसंहार का वर्णन है,यह नाना प्रकार के उपाख्यानों से युक्त पांचवा पर्व है,इन पांच पर्वों में से पहले में मुझ ब्रह्मा की महिमा अधिक है,दूसरे और तीसरे पर्वों में धर्म काम और मोक्ष विषय को लेकर क्रमश: भगवान विष्णु तथा शिव की महिमा का वर्णन है,चौथे पर्व में सूर्य देव की महिमा प्रतिपादन किया गया है,अन्तिम या पांचवां पर्व प्रतिसर्ग नम से प्रसिद्ध है,इसमे सब प्रकार की कथायें है,बुद्धिमान व्यासजी ने इस पर्व का भविष्य की कथाओं के साथ उल्लेख किया है,भविषय पुराण की श्लोक संख्या चौदह हजार बतायी गयी है। इसमे ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सभी देवताओं की समता का प्रतिपादन किया गया है। ब्रह्म सर्वत्र सम है,गुणों के तारतम्य से उसमे विषमता प्रतीत होती है,ऐसा श्रुति का कथन है,जो विद्वान ईर्ष्या द्वेष छोडकर इस पुराण का श्रवण करता है,वह सभी सुखों से पूर्ण हो जाता है।


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