ब्रह्माजी कहते है — भविष्य पुराण को सभी लोगों के मनोरथ को पूरा करने वाला बताया गया है। इस पुराण में ब्रह्मा को सम्पूर्ण देवताओं का आदि स्त्रष्टा बताया गया है। पूर्वकाल में सृष्टि के लिये स्वयम्भू मनु उत्पन्न हुये,उन्होने मुझे प्रणाम करके सर्वार्थसाधक धर्म के विषय में प्रशन किया,तब मैने प्रसन्न होकर उन्हे धर्म संहिता का उपदेश किया। परम बुद्धिमान व्यासजी जब पुराणों का विस्तार करने लगे तो उन्होने उस धर्म संहिता के पांच विभाग किये,उनमे नाना प्रकार की आश्चर्यजनक कथाऒं से युक्त अघोरकल्प का वृतांत है,उस पुराण में पहला पर्व ब्रह्मपर्व के नाम से प्रसिद्ध है,इसी में ग्रन्थ का उपक्रम है,सूत शौनक संवाद में पुराणविषयक प्रश्न है,इसमे अधिकतर सूर्यदेव का ही चरित्र है,अन्य सब उपाख्यान भी इसमे आये हैं.इसमें सृष्टि आदि के लक्षण बताये गये हैं,शास्त्रों क तो यह सर्वस्वरूप है,इसमे पुस्तक लेखक और लेख्यका भी लक्षण दिया गया है। सब प्रकार के संस्कारों का भी लक्षण बताया गया है,पक्ष की आदि सात तिथियों के सात कल्प कहे गये है,अष्टमी आधि तिथियों के शेष आठ कल्प वैष्णवपर्व में बताये गये है,शैवपर्व में ब्रह्मपर्व से भिन्न कथायें है,सौरपर्व में अन्तिम कथाओं का सम्बन्ध देखा जाता है,तत्पश्चार प्रतिसर्ग पर्व है जिसमें पुराण के उपसंहार का वर्णन है,यह नाना प्रकार के उपाख्यानों से युक्त पांचवा पर्व है,इन पांच पर्वों में से पहले में मुझ ब्रह्मा की महिमा अधिक है,दूसरे और तीसरे पर्वों में धर्म काम और मोक्ष विषय को लेकर क्रमश: भगवान विष्णु तथा शिव की महिमा का वर्णन है,चौथे पर्व में सूर्य देव की महिमा प्रतिपादन किया गया है,अन्तिम या पांचवां पर्व प्रतिसर्ग नम से प्रसिद्ध है,इसमे सब प्रकार की कथायें है,बुद्धिमान व्यासजी ने इस पर्व का भविष्य की कथाओं के साथ उल्लेख किया है,भविषय पुराण की श्लोक संख्या चौदह हजार बतायी गयी है। इसमे ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सभी देवताओं की समता का प्रतिपादन किया गया है। ब्रह्म सर्वत्र सम है,गुणों के तारतम्य से उसमे विषमता प्रतीत होती है,ऐसा श्रुति का कथन है,जो विद्वान ईर्ष्या द्वेष छोडकर इस पुराण का श्रवण करता है,वह सभी सुखों से पूर्ण हो जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण वेदमार्ग का दसवां पुराण है। व्यासजी ने ब्रह्मवैवर्त पुराण के चार भाग किये हैं ब्रह्म खण्ड,प्रकृति खण्ड,गणेश खण्ड, और श्रीकृष्ण खण्ड। इन चारों खण्डों से युक्त यह पुराण अठारह हजार श्लोकों का बताया गया है। उसमे सूत और महऋषियों के संवाद में पुराण उपक्रम है। उसमें पहला प्रकरण सृष्टिवर्णन का है। फ़िर नारद और ब्रह्माजी के विवाद का वर्णन है। जिससे दोनों का पराभव हुआ बताया गया है। नारदजी का शिवलोक गमन और और शिवजी से नारद को ज्ञान की प्राप्ति का वर्णन है,उसके बाद शिवजी के कहने से ज्ञान लाभ के लिये सावर्णि के सिद्धसेवित आश्रम में जो पुण्यमय तथा त्रिलोकी को आश्चर्य में डालने वाला था का वर्णन है। इसके बाद नारद और सावर्णि का संवाद का वर्णन है,जिसके अन्दर श्रीकृष्ण का आख्यान और कथायें हैं। प्रकृति की अंशभूत कलाओं के माहत्म्य और पूजन आदिक का विस्तारपूर्वक यथावत वर्णन किया गया है। प्रकृति खण्ड का श्रवण करने पर सुखों की प्राप्ति का आख्यान मिलता है। गणेश खण्ड के वर्णन के विषय में पार्वतीजी के द्वारा कार्तिकेय और गणेश की उत्पत्ति के विषय आख्यान मिलता है। इसके अन्दर ही कार्तवीर्यार्जुन और जमदग्निनन्दन और परशुरामजी में जो महान विवाद हुआ था उसका उल्लेख किया गया है। इसके बाद श्रीकृष्ण जन्म के विषय में कथा का उल्लेख मिलता है।
ब्रह्माजी कहते हैं — बेटा सुनो! अब मैं लिंग पुराण का वर्णन करता हूँ। जो पढने तथा सुनने वालों को भोग और मोक्ष प्रदान करता है,भगवान शंकर ने अग्निलिंग में स्थित होकर अगिनि कल्प की कथा का आश्रय लेकर धर्म आदि की सिद्धि के लिये मुझे जिस लिंगपुराण का उपदेश किया था,उसी को वेदव्यास ने दो भागों में बांटकर कहा है। अनेक प्रकार के उपाख्यानों से विचित्र प्रतीत होने वाला यह लिंगपुराण ग्यारह हजार श्लोकों से युक्त है,और भगवान शिव की महिमा का सूचक है,यह सब पुराणों में श्रेष्ठ तथा त्रिलोकी का सारभूत है,पुराण के आरम्भ में पहले प्रश्न है,फ़िर संक्षेप से सृष्टि का वर्णन किया गया है,तत्पश्चात योगाख्यान और कल्पाख्यान का वर्णन है,इसके बाद लिंग के प्रादुर्भाव और उसकी पूजा की विधि बतायी गयी है,फ़िर सनत्कुमार और शैल आदि का पवित्र संवाद है,तदनन्तर दाधीचि चरित्र युगधर्म निरूपण भुवन कोश वर्णन,तथा सूर्य वंश और चन्द्र वंश का परिचय है,तत्पश्चात विस्तारपूर्वक सृष्टिवर्णन त्रिपुर की कथा,लिंगप्रतिष्ठा,तथा पशुपाश विमोक्ष का प्रसंग है,भगवान शिव के व्रत सदाचार निरूपण प्रायश्चित अरिष्ट काशी तथा श्रीशैल का वर्णन है,फ़िर अन्धकासुर की कथा वाराह चरित्र और जलन्धर वध की कथा है,तदनन्तर शिवसहस्त्रनाम,दक्ष यज्ञ विध्वंस मदन दहन और पार्वती के पाणिग्रहण की कथा है,तत्पश्चात विनायक की कथा भगवान शिवके ताण्डव नृत्य प्रसंग तथा उपमन्यु की कथा है। ये सब विषय लिंगपुराण के पूर्वभाग में कहे गये है,मुने! इसके बाद विष्णु के माहात्म्य का कथन,अम्बरीष की कथा तथा सनत्कुमार और नन्दीश्वर का संवाद है। फ़िर शिव माहात्मय के साथ स्नान योग आदि का वर्णन सूर्यपूजा की विधि तथा मुक्तिदायिनी शिवपूजा का वर्णन है,तदनन्तर अनेक प्रकार के दान कहे गये है,फ़िर श्राद्ध प्रकरण और प्रतिष्ठातन्त्र का वर्णन है,तत्पश्चात अघोरकीर्तन ब्रजेश्वरी महाविद्या,गायत्री महिमा,त्र्यम्बक-माहात्म्य,और पुराण श्रवण के फ़ल का विवरण है। यह लिंगपुराण के उत्तरभाग का परिचय दिया है,यह भगवान रुद्र के माहात्मय का सूचक है,जो इस पुराण को पढता है,वह भगवान शिव और ब्रह्मा तथा विष्णु के लोकों का भागी होता है।
श्री ब्रह्माजी कहते हैं — वत्स! सुनो,अब मैं वाराह पुराण का वर्णन करता हूँ,यह दो भागों से युक्त है,और सनातन भगवान विष्णु के माहात्मय का सूचक है,पूर्वकाल में मेरे द्वारा निर्मित जो मानव कल्प का प्रसंग है,उसी को विद्वानों में श्रेष्ठ साक्षात नारायण स्वरूप वेदव्यास ने भूतल पर इस पुराण में लिपिबद्ध है। वाराह पुराण की श्लोक संख्या चौबीस हजार है,इसमें सबसे पहले पृथ्वी और बाराह भगवान का शुभ संवाद है,तदनन्तर आदि सत्ययुग के वृतांत में रैम्य का चरित्र है,फ़िर दुर्जेय के चरित्र और श्राद्ध कल्प का वर्णन है,तत्पश्चात महातपा का आख्यान,गौरी की उत्पत्ति,विनायक,नागगण सेनानी (कार्तिकेय) आदित्यगण देवी धनद तथा वृष का आख्यान है। उसके बाद सत्यतपा के व्रत की कथा दी गयी है,तदनन्तर अगस्त्य गीता तथा रुद्रगीता कही गयी है,महिषासुर के विध्वंस में ब्रह्मा विष्णु रुद्र तीनों की शक्तियों का माहात्म्य प्रकट किया गया है,तत्पश्चात पर्वाध्याय श्वेतोपाख्यान गोप्रदानिक इत्यादि सत्ययुग वृतान्त मैंने प्रथम भाग में दिखाया गया है,फ़िर भगवर्द्ध में व्रत और तीर्थों की कथायें है,बत्तीस अपराधों का शारीरिक प्रायश्चित बताया गया है,प्राय: सभी तीर्थों के पृथक पृथक माहात्मय का वर्णन है,मथुरा की महिमा विशेषरूप से दी गयी है,उसके बाद श्राद्ध आदि की विधि है,तदनन्तर ऋषि पुत्र के प्रसंग से यमलोक का वर्णन है,कर्मविपाक एवं विष्णुव्रत का निरूपण है,गोकर्ण के पापनाशक माहात्मय का भी वर्नन किया गया है,इस प्रकार वाराहपुराण का यह पूर्वभाग कहा गया है,उत्तर भाग में पुलस्त्य और पुरुराज के सम्वाद में विस्तार के साथ सब तीर्थों के माहात्मय का पृथक पृथक वर्णन है। फ़िर सम्पूर्ण धर्मों की व्याख्या और पुष्कर नामक पुण्य पर्व का भी वर्णन है,इस प्रकार मैने तुम्हें पापनाशक वाराहपुराण का परिचय दिया है,यह पढने और सुनने वाले को मन में भक्ति बढाने वाला है।
माहेश्वरखण्ड
श्रीब्रह्माजी कहते हैं- वत्स ! सुनो, अब मै स्कन्द पुराण का वर्णन करता हूँ,जिसके पद पद में साक्षात महादेवजी स्थित हैं। मैने शतकोटि पुराण में जो शिव की महिमा का वर्णन किया है,उसके सारभूत अर्थ का व्यासजी ने सकन्दपुराण में वर्णन किया है। उसमें सात खण्ड किये गये है,सब पापों का नाश करने वाला स्कन्द पुराण इक्यासी हजार श्लोकों से युक्त है,जो इसका श्रवण अथवा पाठ करत है वह साक्षात शिव ही है,इसमें स्कन्द के द्वारा उन शैव धर्मों का प्रतिपादन किया गया है,जो तत्पुरुष कल्प में प्रचलित थे,वे सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाले इसके पहले खण्ड का नाम माहेश्वर खण्ड है,जि सब पापों का नाश करने वाला इसमें बारह हजार से कुछ कम श्लोक है,यह परम पवित्र तथा विशाल कथाओं से परिपूर्ण है,इसमें सैकडों उत्तम चरित्र है,तथा यह खण्ड स्कन्द स्वामी के माहात्म्य का सूचक है। माहेश्वर खण्ड के भीतर केदार माहात्मय में पुराण आरम्भ हुआ है,उसमें पहले दक्ष यज्ञ की कथा है,इसके बाद शिवलिंग पूजन का फ़ल बताया गया है,इसके बाद समुद्र मन्थन की कथा और देवराज इन्द्र के चरित्र का वर्णन है,फ़िर पार्वती का उपाख्यान और उनके विवाह का प्रसंग है,तत्पश्चात कुमार स्कन्द की उत्पत्ति और तारकासुर के साथ उनके युद्ध का वर्णन है,फ़िर पाशुपत का उपाख्यान और चण्ड की कथा है,फ़िर दूत की नियुक्ति का कथन और नारदजी के साथ समागम का वृतान्त है,इसके बाद कुमार माहात्म्य के प्रसंग में पंचतीर्थ की कथा है,धर्मवर्मा राजा की कथा तथा नदियों और समुद्रों का वर्ण है,तदनन्तर इन्द्रद्युम्न और नाडीजंग की कथा है,फ़िर महीनदी के प्रादुर्भाव और दमन की कथा है,तत्पश्चात मही साकर संगम और कुमारेश का वृतान्त है,इसके बाद नाना प्रकार के उपाख्यानों सहित तारक युद्ध और तारकासुर के वध का वर्णन है,फ़िर पंचलिंग स्थापन की कथा आयी है,तदनन्तर द्वीपों का पुण्यमयी वर्णन ऊपर के लोकों की स्थिति ब्रह्माण्ड की स्थिति और उसका मान तथा वर्करेशकी कथा है,फ़िर वासुदेव का मात्म्य और कोटितीर्थ का वर्णन है। तदनन्तर गुप्तक्षेत्र में नाना तीर्थों का आख्यान कहा गया है,पाण्डवों की पुण्यमयी कथा और बर्बरीक की सहायता से महाविद्या के साधन का प्रसंग है,तत्पश्चात तीर्थयात्रा की समाप्ति है,तदनन्तर अरुणाचल का माहात्मय है,तथा सनक और ब्रह्माजी का संवाद है,गौरी की तपस्या का वर्णन तथा वहां के भिन्न भिन्न तीर्थों का वर्णन है,महिषासुर की कथा और उसके वध का परम अद्भुत प्रसंग कहा गया है,इस प्रकार स्कन्द पुराण में यह अद्भुत माहेश्वर खण्ड में कहा गया है।
वैष्णव-खण्ड
दूसरा वैष्णवखण्ड है, अब उसके आख्यानों का मुझसे श्रवण करो,पहले भूमि वाराह का संवाद का वर्णन है,जिसमें वेंकटाचल का पापनाशक माहात्म्य बताया गया है,फ़िर कमला की पवित्र कथा और श्रीनिवास की स्थिति का वर्णन है,तदनन्तर कुम्हार की कथा तथा सुवर्णमुखरी नदी के माहात्मय का वर्णन है,फ़िर अनेक उपाख्यानों से युक्त भरद्वाज की अद्भुत कथा है,इसके बाद मतंग और अंजन के पापनाशक संवाद का वर्णन है,फ़िर उत्कल प्रदेश के पुरुषोत्तम क्षेत्र का माहात्मय कहा गया है,तत्पश्चार मार्कण्डेयजी की कथा,राजा अम्बरीष का वृतान्त,इन्द्रद्युम्न का आख्यान और विद्यापति की शुभ कथा का उल्लेख है। ब्रह्मन ! इसके बाद जैमिनि और नारद का आख्यान है,फ़िर नीलकण्ठ और नृसिंह का वर्णन है,तदनन्तर अश्वमेघ यज्ञ की कथा और राजा आ ब्रह्मलोक में गमन कहा गया है,तत्पश्चात रथयात्रा विधि और जप तथा स्नान की विधि कही गयी है। फ़िर दक्षिणामूर्ति का उपाख्यान और गुण्डिचा की कथा है,रथ रक्षा की विधि और भगवान के शयनोत्सव का वर्णन है,इसके बाद राजा श्वेत का उपाख्यान कहा गय अहै विर पृथु उत्सव का निरूपण है,भगवान के दोलोत्सव तथा सांवत्सरिक व्रत का वर्णन है,तदनन्तर उद्दालक के नियोग से भगवान विष्णु की निष्काम पूजा का प्रतिपादन किया गया है,फ़िर मोक्ष साधन बताकर नाना प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है,तत्पश्चात दशावतार की कथा अर स्नान आदि का वर्णन है,इसके बाद बदरिकाश्रम तीर्थ का पाप नाशक माहात्मय बताया गया है,उस प्रसंग में अग्नि आदि तीर्थों और गरुण शिला की महिमा है,वहां भगवान के निवास का कारण बताया गया है। फ़िर कपालमोचन तीर्थ पंचधारा तीर्थ और मेरुसंस्थान की कथा है,तदनन्तर कार्तिक मास का माहात्म्य प्रारम्भ होता है,उसमे मदनालस के माहात्मय का वर्णन है,धूम्रकेशका उपाख्यान और कार्तिक मास में प्रत्येक दिन के कृत्य का वर्णन है,अन्त में भीष्म पंचक व्रत का प्रतिपादन किया गया है,जो भोग और मोक्ष देने वाला है। तत्पश्चात मार्गशीर्ष के माहात्म्य में स्नान की विधि बतायी गयी है,फ़िर पुण्ड्रादि कीर्तन और माला धारण का पुण्य कहा गया है,भगवान को पंचामृत से स्नान करवाने तथा घण्टा बजाने आदि का पुण्यफ़ल बताया गया है। नाना प्रकार के फ़ूलों से भगवत्पूजन का फ़ल और तुलसीदल का माहात्म्य बताया गया है,भगवान को नैवैद्य लगाने की महिमा,एकादसी के दिन कीर्तन अखण्ड एकादसी व्रत रहने का पुण्य और एकादशी की रात में जागरण करने का फ़ल बताया गया है। इसके बाद मत्स्योत्सव का विधान और नाममाहात्म्य का कीर्तन है,भगवान के ध्यान आदि का पुण्य तथा मथुरा का माहात्म्य बताया गया है,मथुरा तीर्थ का उत्तम माहात्मय अलग कहा गया है,और वहां के बारह वनों की महिमा वर्णन किया गया है,तत्पश्चात इस पुराण में श्रीमदभागवत के उत्तम माहात्म्य का प्रतिपादन किया गया है इस प्रसंग में बज्रनाभ और शाण्डिल्य के संवाद का उल्लेख किया गया है,जो ब्रज की आन्तरिक लीलाओं का प्रशासक है,तदनन्तर माघ मास में स्नान दान और जप करने का माहात्म्य बताया गया है,जो नाना प्रकार के आख्यानों से युक्त है,माघ माहात्म्य का दस अध्यायों में प्रतिपादन किया गया है,तत्पश्चात बैशाख माहात्म्य में शय्यादान आदि का फ़ल कहा गया है,फ़िर जलदान की विधि कामोपाख्यान शुकदेव चर्त व्याध की अद्भुत कथा और अक्षयतृतीया आदि के पुण्य मा विशेष रूप से वर्णन है,इसके बाद अयोध्या माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमे चक्रतीर्थ ब्रह्मतीर्थ ऋणमोचन तीर्थ पापमोचन तीर्थ सहस्त्रधारातीर्थ स्वर्गद्वारतीर्थ चन्द्रहरितीर्थ धर्महरितीर्थ स्वर्णवृष्टितीर्थ की कथा और तिलोदा-सरयू-संगम का वर्णन है,तदनन्तर सीताकुण्ड गुप्तहरितीर्थ सरयू-घाघरा-संगम गोप्रचारतीर्थ क्षीरोदकतीर्थ और बृहस्पतिकुण्ड आदि पांच तीर्थों की महिमा का प्रतिपादन किया गया है,तत्पश्चात घोषार्क आदि तेरह तीर्थों का वर्णन है। फ़िर गयाकूप के सर्वपापनाशक माहात्म्य का कथन है,तदननतर माण्डव्याश्रम आदि,अजित आदि तथा मानस आदि तीर्थों का वर्णन किया गया है,इस प्रका यह दूसरा वैष्णव खण्ड कहा गया है।
ब्रह्मखण्ड
इसमे पहले सेतुमाहात्म्य प्रारम्भ करके वहां के स्नान और दर्शन का फ़ल बताया गया है,फ़िर गालव की तपस्या तथा राक्षस की कथा है,तत्पश्चात देवीपत्तन में चक्रतीर्थ आदि की महिमा,वेतालतीर्थ का माहात्म्य और पापनाश आदि का वर्णन है,मंगल आदि तीर्थ का माहात्म्य ब्रह्मकुण्ड आदि का वर्णन हनुमत्कुण्ड की महिमा तथा अगस्त्यातीर्थ के फ़ल का कथन है,रामतीर्थ आदि का वर्णन लक्ष्मीतीर्थ का निरूपण शंखतीर्थ की महिमा साध्यातीर्थ के प्रभावों का वर्णन है,फ़िर रामेश्वर की महिमा तत्वज्ञान का उपदेश तथा सेतु यात्रा विधि का वर्णन है,इसके बाद धनुषकोटि आदि का माहात्म्य क्षीरकुण्ड आदि की महिमा गायत्री आदि तीर्थों का माहात्म्य है। इसके बाद धर्मारण्य का उत्तम माहात्मय बताया गया है जिसमे भगवान शिव ने स्कन्द को तत्व का उपदेश दिया है,फ़िर धर्माण्य का प्रादुर्भाव उसके पुण्य का वर्णन कर्मसिद्धि का उपाख्यान तथा ऋषिवंश का निरूपण किया गया है,इसके बाद वर्णाश्रम धर्म के तत्व का निरूपण है,तदनन्तर देवस्थान-विभाग और बकुलादित्य की शुभ कथा का वर्णन है। वहां छात्रानन्दा शान्ता श्रीमाता मातंगिनी और पुण्यदा ये पांच देवियां सदा स्थित बतायी गयी है। इसके बाद यहां इन्द्रेश्वर आदि की महिमा तथा द्वारका आदि का निरूपण है,लोहासुर की कथा गंगाकूप का वर्णन श्रीरामचन्द्र का चरित्र तथा सत्यमन्दिर का वर्णन है,फ़िर जीर्णोद्धार की महिमा का कथन आसनदान जातिभेद वर्णन तथा स्मृति-धर्म का निरूपण है।इसके बाद अनेक उपाख्यानो से युक्त वैष्णव धर्म का निरूपण है। इसके बाद मुण्यमय चातुरमास्य का माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें पालन करने योग्य सब धर्मों का निरूपण किया गया है,फ़िर दान की प्रसंसा व्रत की महिमा तपस्या और पूजा का माहात्म्य तथा सच्छूद्र का कथन है,इसके बाद प्रकृतियों के भेद का वर्णन शालग्राम के तत्व का निरूपण तारकासुर के वध का उपाय,गरुडपूजन की महिमा,विष्णु का शाप,वृक्षभाव की प्राप्ति, पार्वती का अनुभव,भगवान शिव का ताण्डव नृत्य,रामनाम की महिमा का निरूपण शिवलिंगपतन की कथा,पैजवन शूद्र की कथा, पार्वती के जन्म और चरित्र,तारकासुर का अद्भुत वध,प्रणव के ऐश्वर्य का कथन,तारकासुर के चरित्र का पुनर्वणन, दक्ष-यज्ञ की समाप्ति,द्वादसाक्षरमंत्र का निरूपण ज्ञानयोग का वर्णन,द्वादश सूर्यों की महिमा तथा चातुर्मास्य-माहात्म्य के श्रवण आदि के पुण्य का वर्णन, किया गया है,जो मनुष्यों के लिये कल्याणकारक है। इसके बाद ब्राह्मोत्तर भाग में भगवान शिव की अद्भुत महिमा पंचाक्षरमंत्र के माहात्म्य तथा गोकर्ण की महिमा है,इसके बाद शिवरात्रि की महिमा प्रदोषव्रत का वर्णन है,तथा सोमवारव्रत की महिमा एवं सीमन्तिनी की कथा है। फ़िर भद्रायु की उत्पत्ति का वर्णन सदाचार-निरूपण शिवकवच का उपदेश भद्रायु के विवाह का वर्णन भद्रायु की महिमा भस्म-माहात्म्य-वर्णन,शबर का उपाख्यान उमामहेश्वर व्रत की महिमा रुद्राक्ष का माहात्म्य रुद्राध्याय के पुण्य तथा ब्रह्मखण्ड के श्रवण आदि की महिमा का वर्णन है।
काशीखण्ड
काशीखण्ड में विंध्यपर्वत और नारदजी का संवाद का वर्णन है,सत्यलोक का प्रभाव,अगस्त्य के आश्रम में देवताओं का आगमन,पतिव्रताचरित्र,तथा तीर्थ यात्रा की प्रसंशा है,इसके बाद सप्तपुरी का वर्णन सयंमिनी का निरूपण शिवशर्मा को सूर्य इन्द्र और अग्नि लोक की प्राप्ति का उल्लेख है। अग्नि का प्रादुर्भाव निऋति तथा वरुण की उत्पत्ति,गन्धवती अलकापुरी अर ईशानपुरी के उद्भव का वर्णन,चन्द्र सूर्य बुध मंगल तथा बृहस्पति के लोक ब्रह्मलोक विष्णुलोक ध्रुवलोक और तपोलोक का वर्णन है। इसके बाद ध्रुवलोक की पुण्यमयी कथा,सत्यलोक का निरीक्षण,स्कन्द अगस्त्य संवाद,मणिकर्णिका की उत्पत्ति,गंगाजी का प्राकट्य,गंगासहस्त्रनाम,काशीपुरी की प्रशंसा,भैरव का आविर्भाव,दण्डपाणि तथा ज्ञानवापी का उद्भव,कलावती की कथा,सदाचार निरूपण ब्रह्मचारी का आख्यान स्त्री के लक्षण,कर्तव्याकर्तव्य का निर्देश,अविमुक्तेश्वर का वर्णन,गृहस्थ योगी के धर्म,कालज्ञान,दिवोदास की पुण्यमयी कथा,काशी का वर्णन,भूतल पर माया गणपति का प्रादुर्भाव,विष्णुमाया का प्रपंच,दिवोदास का मोक्ष,पंचनद तीर्थ की उत्पत्ति,विन्दुमाधव का प्राकट्य,काशी का वैष्णव तीर्थ का दर्जा,शूलधारी शिवजी का काशी में आगमन,जोगीषव्य के साथ संवाद,महेश्वर का ज्येष्ठेश्वर नाम होना,क्षेत्राख्यान कन्दुकेश्वर और व्याघ्रेश्वर का प्रादुर्भाव,शैलेश्वर रत्नेश्वर तथ कृत्तिवाशेश्वर का प्राकट्य,देवताओं का अधिष्ठान,दुर्गासुर का पराक्रम,दुर्गाजी की विजय,ऊँकारेश्वर का वर्णन,पुन: ऊँकारेश्वर का माहात्म्य,त्रिलोचन का प्रादुर्भाव केदारेश्वर का आख्यान,धर्मेश्वर की कथा,विष्णुभुजा का प्राकट्य,वीरेश्वर का आख्यान,गंगामाहात्म्यकीर्तन,विश्वकर्मेश्वर की महिमा,दक्षयज्ञोद्भव,सतीश और अमृतेश आदि का माहात्म्य पराशरनन्दन व्यासजी की भुजाओं का स्तम्भन,क्षेत्र के तीर्थों का समुदाय,मुक्तिमण्डप की कथा विश्वनाथजी का वैभव,तदनन्तर काशी की यात्रा और परिक्रमा का वर्णन काशीखण्ड के अन्दर है।
अवन्तीखण्ड
इसमे महाकालवन का आख्यान,ब्रह्माजी के मस्तक का छेदन,प्रायश्चित विधि अग्नि की उत्पत्ति देवताओं का आगमन देवदीक्षा नाना प्रकार के पातकों का नाश करने वाला शिवस्तोत्र कपालमोचन की कथा,महाकालवन की स्थिति,ककलेश्वर का महापापनाशक तीर्थ अप्सराकुण्ड,पुण्यदायक रुद्रसरोवर,कुटुम्बेश विध्याधरेश्वर तथा मर्कटेश्वर तीर्थ का वर्णन है,तत्पश्चात स्वर्गद्वार चतु:सिन्धुतीर्थ,शंकरवापिका,शंकरादित्य,पापनाशक गन्धवतीर्थ,दशाश्वमेघादि तीर्थ,अनंशतीर्थ हरिसिद्धिप्रदतीर्थ पिशाचादियात्रा,हनुमदीश्वर कवचेश्वर महाकलेश्वरयात्रा,वल्मीकेश्वर तीर्थ,शुक्रेश्वर और नक्षत्रेश्वर तीर्थ का उपाख्यान,कुशस्थली की परिक्रमा अक्रूर तीर्थ एकपादतीर्थ चन्द्रार्कवैभवतीर्थ,करभेषतीर्थ,लडुकेशतीर्थ,मार्कण्डेश्वरतीर्थ,यज्ञवापीतीर्थ,सोमेशवरतीर्थ,नरकान्तकतीर्थ,केदारेश्वर रामेश्वर सौभागेश्वर,तथा नरादित्य तीर्थ,केशवादित्य तीर्थ,शक्तिभेदतीर्थ स्वर्णसारमुख तीर्थ,ऊँकारेश्वरतीर्थ,अन्धकासुर के द्वारा स्तुति कीर्तन कालवन में शिव लिंगों की संख्या तथा स्वर्णश्रंगेश्वर तीर्थ का वर्णन है। कुशस्थली अवन्ती एवं उज्ज्यनीपुरी के पद्मावती कुमुद्वती अमरावती विशाला तथा प्रतिकल्पा इन नामों का उल्लेख है,इनका उच्चारण ज्वर की शान्ति करने वाला है,तत्पश्चत शिप्रा में स्नान आदि का फ़ल नागों द्वारा की हुई भगवान शिवकी स्तुति हिरण्याक्ष वध की कथा सुन्दरकुण्डतीर्थ नीलगंगा पुष्करतीर्थ विन्ध्यवासनतीर्थ पुरुषोत्तमतीर्थ अघनाशनतीर्थ गोमतीतीर्थ वामनकुण्डतीर्थ विष्णुसहस्त्रनाम कीर्तन वीरेश्वरतीर्थ कालभैरवतीर्थ नागपंचमी की महिआ नृसिंहजयन्ती कुटुम्बेश्वरयात्रा देवसाधककीर्तन,कर्कराजतीर्थ,विघ्नेशादितीर्थ,सुरोहनतीर्थ, का वर्णन किया गया है। रुद्रकुण्ड आदि में अनेक तीर्थों का निरूपण किया गया है,तदनन्तर आठ तीर्थों की पुण्यमयी तीर्थयात्रा का विवरण है। इसके बाद नर्मदा नदी का माहात्मय बताया गया है,जिसमें युधिष्ठर के वैराग्य तथा मार्कण्डेयजी के साथ उनके समागम का वर्णन है। इसके बाद पहले प्रलयकालीन समय का अनुभव का वर्णन अमृतकीर्तन कल्प कल्प में नर्मदा के अलग अलग नामों का वर्णन नर्मदाजी का आर्षस्तोत्र कालरात्रि की कथा,महादेवजी की स्तुति अलग अलग कल्प की अद्भुत कथा,विशल्या की कथा,जालेश्वर की कथा,गौरीव्रत का विवरण,त्रिपुरदाह की कथा,देहपातविधि,कावेरी संगम,दारूतीर्थ,ब्रह्मवर्त ईश्वरकथा,अग्नितीर्थ सूर्यतीर्थ मेघनादादि तीर्थ दारूकतीर्थ देवतीर्थ नर्मदेशतीर्थ कपिलातीर्थ करंजकतीर्थ कुण्डलेशतीर्थ पिप्प्लादितीर्थ विमलेश्वरतीर्थ,शूलभेदनतीर्थ,अलग अलग दानधर्म दीर्घतपा की कथा,ऋष्यश्रंग का उपाख्यान,चित्रसेन की पुण्यमयी कथा,काशिराज का मोक्ष,देवशिला की कथा,शबरीतीर्थ,पवित्र व्याधोपाख्यान,पुष्कणीतीर्थ अर्कतीर्थ आदित्येश्वरतीर्थ,शक्रतीर्थ,करोटितीर्थ,कुमारेश्वरतीर्थ अगस्तेश्वरतीर्थ आनन्देश्वरतीर्थ मातृतीर्थ लोकेश्वर,धनेश्वर मंगलेश्वर तथा कामजतीर्थ नागेश्वरतीर्थ वरणेश्वरतीर्थ दधिस्कन्दादितीर्थ हनुमदीश्वरतीर्थ रामेश्वरतीर्थ सोमेश्वरतीर्थ पिंगलेश्वरतीर्थ ऋणमोक्षेश्वर कपिलेश्वर पूतिकेश्वर,जलेशय,चण्डार्क यमतीर्थ काल्होडीश्वर नन्दिकेश्वर नारायणेश्वर कोटीश्वर व्यासतीर्थ प्रभासतीर्थ संकर्षणतीर्थ प्रश्रेश्वरतीर्थ एरण्डीतीर्थ सुवर्णशिलातीर्थ,करंजतीर्थ,कामरतीर्थ,भाण्डीरतीर्थ, रोहिणीभवतीर्थ चक्रतीर्थ धौतपापतीर्थ आंगिरसतीर्थ कोटितीर्थ अन्योन्यतीर्थ अंगारतीर्थ त्रिलोचनतीर्थ इन्द्रेशतीर्थ कम्बुकेशतीर्थ सोमतेशतीर्थ कोहलेशतीर्थ नर्मदातीर्थ अर्कतीर्थ आग्नेयतीर्थ उत्तमभार्गवेश्वरतीर्थ ब्राह्मतीर्थ दैवतीर्थ,मार्गेशतीर्थ आदिवाराहेश्वर,रामेश्वरतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ,अहल्यातीर्थ कंकटेश्वरतीर्थ,शक्रतीर्थ,सोमतीर्थ,नादेशतीर्थ,कोयेशतीर्थ,रुक्मिणी आदि तीर्थों का विवेचन है।इसके साथ ही नागर खण्ड में भी तीर्थों का वर्णन है प्रभासखण्ड में विभिन्न नामॊं से शिवजी के स्थानों का विवेचन है|
ब्रह्माजी कहते है—- वत्स! सुनो,अब मै त्रिविक्रम चरित्र से युक्त वामनपुराण का वर्णन करता हूँ,इसकी श्लोक संख्या दस हजार है,इसमें कूर्म कल्प के वृतान्त का वर्णन है,और त्रिवर्ण की कथा है। यह पुराण दो भागों से युक्त है,और वक्ता श्रोता दोनों के लिये शुभकारक है,इसमें पहले पुराण के विषय में प्रश्न है,फ़िर ब्रह्माजी के शिरच्छेद की कथा कपाल मोचर का आख्यान और दक्ष यज्ञ विध्वंश का वर्णन है। इसके बाद भगवान हर की कालरूप संज्ञा मदनदहन प्रहलाद नारायण युद्ध देवासुर संग्राम सुकेशी और सूर्य की कथा,काम्यव्रत का वर्णन,श्रीदुर्गा चरित्र तपती चरित्र कुरुक्षेत्र वर्णन अनुपम सत्या माहात्म्य पार्वती जन्म की कथा,तपती का विवाह गौरी उपाख्यान कुमार चरित अन्धकवध की कथा साध्योपाख्यान जाबालचरित अरजा की अद्भुतकथा अन्धकासुर और शंकर का युद्ध अन्धक को गणत्व की प्राप्ति मरुदगणों के जन्म की कथा राजा बलि का चरित्र लक्ष्मी चरित्र त्रिबिक्रम चरित्र प्रहलाद की तीर्थ यात्रा और उसमें अनेक मंगलमयी कथायें धुन्धु का चरित्र प्रेतोपाख्यान नक्षत्र पुरुष की कथा श्रीदामा का चरित्र त्रिबिक्रम चरित्र के बाद ब्रह्माजी द्वारा कहा हुआ उत्तम स्तोत्र तथा प्रहलाद और बलि के संवाद के सुतल लोक में श्रीहरि की प्रशंसा का उल्लेख है।
इसमे लक्ष्मी कल्प का बखान है,इसमें ऋषियों के समागम में भगवान ने धर्म अर्थ काम और मोक्ष का अलग अलग वर्णन किया है,यह चार संहिताओं में विभक्त है,इसकी श्लोक संख्या सतरह हजार है। इसमे मनुष्य को सदगति प्राप्त करने वाले नाना प्रकार के ब्राह्मण धर्म बताये गये है। वर्णाश्रम सम्बन्धी आचार धर्म जगत की उत्पत्ति संक्षेप से कालसंख्या का वर्णन प्रलय के अन्त में भगवान का स्तवन संक्षेप से सृष्टि का वर्णन शंकर चरित्र पार्वती सहस्त्रनाम योग निरूपण भृगुवंश वर्णन स्वायम्भुव मनु तथा देवता आदि की उत्पत्ति दक्ष यज्ञ का विध्वंस दक्ष सृष्ति कथन कश्यप के वंश का वर्णन अत्रिवंश का परिचय श्रीकृष्ण का चरित्र इसके उत्तर भाग में ईश्वरीय गीता फ़िर व्यासगीता है,जो नाना प्रकार के धर्मों का उपदेश देने वाली है। इसमें ब्राह्मी संहिता का कथन है,फ़िर भगवती संहिता का कथन है। पहली संहिता में ब्राह्मणों के धर्म की बातें और आचार विचार पर चलने वाली बाते बताईं गयी है,दूसरे भाग में भगवती संहिता के अन्दर क्षत्रिय वंश को आचार विचार से चलने वाली बातें बतायीं गयी है। तीसरी सौरी संहिता है जो मनुष्यों को नाना प्रकार की सिद्धि देने वाली है,और चौथी वैष्णवी संहिता है,जिसके द्वारा मोक्ष प्राप्त करने वाली बाते लिखीं गयी है।





















